सूखा और अल नीनो (El Nino) का खतरा: 10 सूखा-रोधी धान की किस्में बचाएंगी किसानों की लागत और फसल

सूखा-रोधी धान की किस्में

भारत में मानसून और खेती का गहरा रिश्ता है, लेकिन जब-जब प्रशांत महासागर में ‘अल नीनो’ (El Niño) की सक्रियता बढ़ती है, तब-तब भारतीय कृषि, विशेषकर खरीफ सीजन की मुख्य फसल—धान की खेती पर सूखे का संकट मंडराने लगता है। अल नीनो के कारण मानसून में देरी, कम बारिश या बारिश के बीच लंबा सूखा अंतराल (Dry Spells) देखने को मिलता है।

ऐसे संकट के समय पारंपरिक और ज्यादा पानी चाहने वाली धान की किस्में लगाने से न केवल फसल झुलस जाती है, बल्कि ट्यूबवेल चलाने में डीजल का खर्च किसानों का बजट बिगाड़ देता है। इस स्थिति से निपटने का एकमात्र वैज्ञानिक तरीका है—सूखा सहन करने वाली उन्नत धान की किस्मों (Drought Resistant Paddy Varieties) का चयन करना।

आज के इस विशेष लेख में हम भारत की टॉप सूखा-रोधी धान की किस्मों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के लिए विशेष रूप से अनुशंसित (Recommended) वैरायटीज़ के बारे में विस्तार से समझेंगे।

सूखा-रोधी किस्मों की खासियत क्या होती है?

सामान्य धान की किस्मों को पकने के लिए लगातार पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन सूखा-रोधी (Drought-Tolerant) किस्मों में कुछ विशेष गुण होते हैं:

  • गहरी जड़ें: इन पौधों की जड़ें जमीन में काफी गहराई तक जाती हैं, जिससे ये भूजल की निचली परतों से भी नमी सोख लेती हैं।
  • कम समय में पकना: ये किस्में 110 से 125 दिनों के भीतर पककर तैयार हो जाती हैं, जिससे सितंबर-अक्टूबर में होने वाले सूखे के असर से बच जाती हैं।
  • कम पानी में बेहतर उपज: यदि रोपाई या कल्ले फूटने के समय 15-20 दिनों तक बारिश न भी हो, तब भी पौधों की वृद्धि नहीं रुकती।

उत्तर प्रदेश (UP) के लिए विशेष सूखा-रोधी धान की किस्में

उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वांचल (बस्ती, गोरखपुर, देवरिया) और बुंदेलखंड के क्षेत्रों में अल नीनो का असर सबसे ज्यादा देखा जाता है। यहाँ के किसानों के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने निम्नलिखित किस्में सुझाई हैं:

1. सहभागी धान (Sahbhagi Dhan)

  • अवधि: 110 से 115 दिन।
  • विशेषता: यह सूखे के प्रति देश की सबसे लोकप्रिय और प्रमाणित किस्म है। यदि फसल के दौरान लगातार 20-25 दिनों तक सूखा रहे, तब भी इसके उत्पादन पर भारी गिरावट नहीं आती।
  • पैदावार: 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

2. नरेंद्र धान 8002 (Narendra Dhan 8002)

  • अवधि: 115 से 120 दिन।
  • विशेषता: आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित यह किस्म कम पानी और मध्यम उपजाऊ भूमि के लिए सर्वोत्तम है। इसके दाने मध्यम और वजनदार होते हैं।
  • पैदावार: 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक।

3. डीआरआर धान 44 (DRR Dhan 44)

  • अवधि: 120 से 125 दिन।
  • विशेषता: भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (IIRR) द्वारा विकसित यह वैरायटी कल्ले फूटने की अवस्था में पानी की कमी को बहुत आसानी से सहन कर सकती है।

4. कालानमक किरण (Kalanamak Kiran) – सुगंधित और सूखा-सहनशील बोनी किस्म

  • अवधि: 135 से 140 दिन।
  • विशेषता: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र (विशेषकर बांसी, बस्ती, सिद्धार्थनगर और गोरखपुर) के ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) के तहत प्रसिद्ध पारंपरिक कालानमक धान की यह एक अत्यंत उन्नत और बौनी (Dwarf) किस्म है। पारंपरिक कालानमक धान के पौधे बहुत लंबे होते थे, जो थोड़ी सी तेज हवा या पानी की कमी में गिर जाते थे, लेकिन ‘कालानमक किरण’ कद में छोटी होने के कारण गिरती नहीं है। यह सूखा और कम पानी की स्थिति के प्रति बहुत सहनशील है।
  • पैदावार: 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (इसके चावल में वही पारंपरिक सोंधी खुशबू और बेजोड़ स्वाद होता है, जिससे मंडियों में इसकी कीमत सामान्य धान से दोगुनी मिलती है)।

बिहार (Bihar) के लिए विशेष सूखा-रोधी धान की किस्में

बिहार में अक्सर एक अजीब स्थिति देखने को मिलती है—एक तरफ उत्तर बिहार में बाढ़ तो दूसरी तरफ दक्षिण बिहार के जिलों (जैसे गया, औरंगाबाद, नवादा) में गंभीर सूखा। अल नीनो के दौरान दक्षिण बिहार के किसानों के लिए ये किस्में जीवनदान साबित होती हैं:

1. स्वर्ण श्रेया (Swarna Shreya)

  • अवधि: 125 से 130 दिन।
  • विशेषता: यह आईसीएआर (ICAR) पटना द्वारा विशेष रूप से सूखे क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है। यह सीधी बिजाई (DSR तकनीक) के लिए भी बहुत उपयुक्त है और इसमें तना छेदक कीटों का प्रकोप कम होता है।
  • पैदावार: 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

2. शुष्क सम्राट (Shusk Samrat)

  • अवधि: 110 से 115 दिन।
  • विशेषता: जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह सूखे खेतों का सम्राट है। यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई के भी औसत पैदावार देने में सक्षम है।
  • पैदावार: 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

3. प्रभात (Prabhat)

  • अवधि: मात्र 90 से 95 दिन।
  • विशेषता: यह बिहार की सबसे कम समय में पकने वाली अति-शीघ्र किस्म है। यदि मानसून बहुत ज्यादा लेट हो जाए, तब भी इसकी बुवाई करके किसान भाई समय पर खेत खाली कर रबी (गेहूं) की फसल ले सकते हैं।

मध्य प्रदेश (MP) के लिए विशेष सूखा-रोधी धान की किस्में

मध्य प्रदेश के महाकौशल, बुंदेलखंड और मालवा अंचल के कई जिलों में धान की खेती पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर है। एमपी के किसानों के लिए निम्नलिखित किस्में वरदान हैं:

1. जेआर 206 (JR 206) और जेआर 201

  • अवधि: 110 से 115 दिन।
  • विशेषता: जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय (JNKVV), जबलपुर द्वारा विकसित ये किस्में हल्की और पथरीली जमीनों में भी बेहतरीन प्रदर्शन करती हैं। इन्हें बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है।
  • पैदावार: 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक।

2. इंदिरा बारानी धान 1 (Indira Barani Dhan 1)

  • अवधि: 115-120 दिन।
  • विशेषता: यह छत्तीसगढ़ और पूर्वी मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों (जहां सिंचाई के साधन सीमित हैं) के लिए विशेष रूप से तैयार की गई है। यह मिट्टी की कम नमी में भी दानों का भराव अच्छे से करती है।

अल नीनो में खेती करने के 3 वैज्ञानिक तरीके

केवल अच्छी किस्म का चयन करना काफी नहीं है, अल नीनो जैसी आपातकालीन स्थिति में किसानों को अपनी कृषि पद्धति में भी ये बदलाव करने चाहिए:

  1. सीधी बिजाई (DSR – Direct Seeded Rice): पारंपरिक रूप से धान की नर्सरी तैयार कर रोपाई करने के बजाय सीधे सीड-ड्रिल मशीन से सूखे खेत में बुवाई करें। इससे लगभग 30% पानी की बचत होती है और नर्सरी ओवर-एज होने का खतरा टल जाता है।
  2. जिंक और पोटाश का उचित प्रयोग: बुवाई या रोपाई के समय खेत में जिंक सल्फेट और पोटाश की अनुशंसित मात्रा ज़रूर डालें। पोटाश पौधों के भीतर पानी के वाष्पीकरण को नियंत्रित करता है, जिससे पौधा सूखे के प्रति सहनशील बनता है।
  3. यूरिया का छिड़काव रोकें: यदि बारिश में लंबा गैप हो और खेत में पर्याप्त नमी न हो, तो यूरिया का छिड़काव कतई न करें। बिना पानी के यूरिया डालने से फसलें नीचे से जलने (झुलसने) लगती हैं।

यह भी पढ़ें: धान की खेती: 115 से 120 दिन में पकने वाली सबसे उन्नत किस्में, कम समय में मिलेगी रिकॉर्ड तोड़ पैदावार

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सूखा-रोधी धान की किस्मों से जुड़े मुख्य सवाल-जवाब (FAQs)

  1. क्या सूखा-रोधी (Drought Tolerant) धान की किस्मों की चावल गुणवत्ता सामान्य धान जैसी ही होती है?

    हाँ, बिल्कुल। वैज्ञानिक रूप से विकसित की गई आधुनिक सूखा-रोधी किस्में जैसे सहभागी धान या स्वर्ण श्रेया का चावल खाने में स्वादिष्ट और पकाने में बहुत अच्छा होता है। इनके दानों का आकार मध्यम से लंबा और वजनदार होता है, जिससे बाजार (मंडी) में भी किसानों को इसका पूरा और सही दाम मिलता है।

  2. अगर मानसून सामान्य रहे और भारी बारिश हो जाए, तो क्या सूखा-रोधी धान की फसल खराब हो जाएगी?

    नहीं, यह इन किस्मों की सबसे बड़ी खासियत है। ये किस्में ‘सूखा-रोधी’ होने के साथ-साथ ‘लचीली’ (Flexible) भी होती हैं। यदि अल नीनो का असर कम रहे और अच्छी बारिश हो जाए, तब भी ये फसलें अत्यधिक पानी को आसानी से संभाल लेती हैं और सामान्य धान की तरह ही भरपूर या उससे भी बेहतर उत्पादन देती हैं।

  3. कम पानी वाली धान की किस्मों के लिए ‘सीढ़ीदार’ या ‘सीधी बिजाई’ (DSR) तकनीक क्यों बेहतर मानी जाती है?

    अल नीनो या सूखे की स्थिति में खेत में पानी भरकर रोपाई (Puddling) करना बहुत मुश्किल होता है। सीधी बिजाई (Direct Seeded Rice) में लेह लगाने और नर्सरी तैयार करने का झंझट खत्म हो जाता है। सूखे खेत में सीधे बीज बोने से धान के पौधे शुरू से ही कम पानी में सरवाइव करना सीख जाते हैं और उनकी जड़ें पानी की तलाश में जमीन के काफी नीचे तक चली जाती हैं, जिससे सूखा सहने की क्षमता दोगुनी हो जाती है।

  4. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड और तराई क्षेत्र के लिए सबसे भरोसेमंद सूखा-रोधी किस्म कौन सी है?

    उत्तर प्रदेश के कम पानी वाले और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्रों के लिए सहभागी धान और नरेंद्र धान 8002 को सबसे भरोसेमंद माना गया है। सहभागी धान महज़ 110 दिनों में पककर तैयार हो जाता है, जिससे यह फसल के अंतिम चरणों में होने वाले पानी के संकट से पूरी तरह बच जाता है।

  5. क्या इन सूखा-रोधी किस्मों में रोग और कीटों का प्रकोप कम होता है?

    जी हाँ, इन उन्नत किस्मों को तैयार करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है। उदाहरण के लिए, बिहार के लिए अनुशंसित स्वर्ण श्रेया और मध्य प्रदेश की जेआर सीरीज़ की किस्में ब्लास्ट रोग (झोंका), तना छेदक (Stem Borer) और भूरा झुलसा जैसी घातक बीमारियों के प्रति काफी हद तक प्रतिरोधी (Resistant) हैं, जिससे किसानों का कीटनाशकों पर होने वाला अतिरिक्त खर्च बच जाता है।

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