उत्तर प्रदेश में धान की खेती का सीजन शुरू हो चुका है। आज के समय में जलवायु परिवर्तन और बेमौसम बारिश को देखते हुए कृषि वैज्ञानिक किसानों को कम अवधि (Short Duration Varieties) वाली धान की किस्में उगाने की सलाह देते हैं।
जो धान 115 से 120 दिनों में पककर तैयार हो जाते हैं, वे न केवल पानी की बचत करते हैं बल्कि अक्टूबर के अंत तक खेत को पूरी तरह खाली कर देते हैं। इससे उत्तर प्रदेश के किसान भाई समय पर अगेती आलू, मटर और अगेती गेहूं की बुवाई कर बिना किसी देरी के साल में तीन फसलें ले सकते हैं। आइए जानते हैं उत्तर प्रदेश की जलवायु के लिए सबसे उपयुक्त 115-120 दिन वाली धान की प्रमुख सरकारी, रिसर्च और हाइब्रिड किस्मों के बारे में।
115 से 120 दिन वाली धान की टॉप किस्में (Best Paddy Seeds List)
उत्तर प्रदेश के सिंचित और अर्ध-सिंचित दोनों क्षेत्रों के लिए कृषि विश्वविद्यालयों और प्रमुख बीज कंपनियों द्वारा प्रमाणित टॉप किस्में निम्नलिखित हैं:
1. डीआरआर धान 44 (DRR Dhan 44)
- अवधि: 115 से 120 दिन.
- विशेषताएं: यह किस्म भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (IIRR) द्वारा विकसित की गई है। यह सूखा सहन करने की गजब की क्षमता रखती है। अगर मॉनसून के दौरान बारिश कम भी होती है, तो भी इसकी पैदावार पर बुरा असर नहीं पड़ता।
- दाना और उपज: इसके दाने लंबे और पतले (Long Slender) होते हैं। इसकी औसत पैदावार 22 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक मिल जाती है।
2. आईआर 64 (IR 64)
- अवधि: 115 से 120 दिन.
- विशेषताएं: यह भारत भर में सबसे लोकप्रिय और सदाबहार किस्मों में से एक है। इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के (Semi-dwarf) होते हैं जिसके कारण तेज हवा चलने पर भी फसल खेत में गिरती (Lodging) नहीं है।
- रोग प्रतिरोधकता: यह किस्म राइस ब्लास्ट (झुलसा रोग) के प्रति काफी प्रतिरोधी मानी जाती है.
3. पैन 243 (Pan 243)
- अवधि: 115 से 120 दिन (नर्सरी से कटाई तक).
- विशेषताएं: निजी क्षेत्र में यह उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के किसानों के बीच बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि पकने के बाद इसके दाने बालियों से टूटकर खेत में झड़ते नहीं हैं।
- रोग प्रतिरोधकता: यह बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB) और स्टेम बोरर (तना छेदक) के प्रति बेहतरीन सहनशीलता रखती है।
4. मंजू गोल्ड और सिंधु धान (Research Varieties)
- अवधि: 115 से 120 दिन.
- विशेषताएं: यह दोनों ही संशोधित (Research) किस्में हैं जो कम समय वाले सेगमेंट में आती हैं। इनके पौधों की ऊंचाई 95 से 100 सेंटीमीटर के बीच होती है।
- पैदावार: अगर सही खाद और पानी का प्रबंधन किया जाए, तो यह आसानी से 25 से 26 क्विंटल प्रति एकड़ की बंपर पैदावार दे देती हैं। इसके दाने मध्यम-मोटे और चमकदार सफेद होते हैं, जिससे बाजार में इनका अच्छा भाव मिलता है।
5. सुकारा धान-1 (Sukara Dhan-1)
- अवधि: 110 से 120 दिन.
- विशेषताएं: यह अगेती किस्म सीधी बिजाई (DSR – Direct Seeded Rice) और रोपाई दोनों के लिए बहुत उपयुक्त है। इसके दाने लंबे, पतले और साफ होते हैं।
- बीमारी से सुरक्षा: यह जीवाणु झुलसा और बदरंगा रोग के प्रति पूर्ण रूप से प्रतिरोधी है, जिससे दवाओं का खर्च बच जाता है।
📋 किस्मों का तुलनात्मक विवरण (Quick Comparison)
किसानों की आसानी के लिए नीचे दी गई तालिका से आप अपनी पसंद की किस्म चुन सकते हैं:
| धान की किस्म का नाम | पकने की अवधि (दिन) | प्रति एकड़ औसत उपज | दाने का प्रकार | मुख्य विशेषता |
| DRR Dhan 44 | 115 – 120 दिन | 20 – 22 क्विंटल | लंबा और पतला | सूखा सहन करने में सक्षम |
| IR 64 | 115 – 120 दिन | 22 – 24 क्विंटल | बारीक और लंबा | पौधा गिरता नहीं, चावल बेस्ट |
| Pan 243 | 115 – 120 दिन | 25 – 27 क्विंटल | मध्यम लंबा | दाने झड़ने की समस्या नहीं |
| मंजू गोल्ड / सिंधु | 115 – 120 दिन | 25 – 26 क्विंटल | मध्यम मोटा | कम समय में अधिक मुनाफा |
🌾 कम समय वाली किस्मों के लिए वैज्ञानिक खेती के टिप्स
अगर आप इन 115-120 दिन वाली किस्मों से पूरी पैदावार लेना चाहते हैं, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें:
- सही समय पर नर्सरी: उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में इन किस्मों की नर्सरी 20 मई से 15 जून के बीच डाल देनी चाहिए, ताकि जून के अंत या जुलाई के पहले सप्ताह तक रोपाई पूरी हो सके।
- संतुलित यूरिया का प्रयोग: चूंकि ये किस्में कम समय की होती हैं, इसलिए इनमें नाइट्रोजन (यूरिया) की आखिरी डोज रोपाई के 40 से 45 दिनों के भीतर ही पूरी कर लें। देर से यूरिया डालने पर फसल पकने में ज्यादा समय ले सकती है।
- जिंक की कमी दूर करें: उत्तर प्रदेश की मिट्टी में जिंक की भारी कमी देखी जाती है। कल्ले (Tillers) अधिक फूटें इसके लिए रोपाई के समय 10 किग्रा जिंक सल्फेट प्रति एकड़ की दर से जरूर डालें।
किसान पॉलिसी की सलाह (Kisan Policy Tip): कम दिनों की वैरायटी लगाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सितंबर-अक्टूबर में आने वाले चक्रवाती तूफानों और बेमौसम बारिश से पहले ही आपकी फसल कटकर घर आ जाती है, जिससे नुकसान का खतरा ना के बराबर रहता है।
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