उत्तर प्रदेश के तराई और पूर्वांचल क्षेत्र (सिद्धार्थनगर, बस्ती, संत कबीर नगर, गोरखपुर, देवरिया और महाराजगंज) का भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त ‘काला नमक चावल’ अपनी बेजोड़ खुशबू, बेहतरीन स्वाद और औषधीय गुणों (लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स, जिंक और आयरन से भरपूर) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।
पारंपरिक काला नमक धान का पौधा बहुत लंबा (लगभग 140-150 सेमी) होता था, जिससे वह बालियां आने पर गिर (Lodging) जाता था और पैदावार घटकर मात्र 15-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह जाती थी। इस ऐतिहासिक चावल में क्रांति लाने का श्रेय मुख्य रूप से IARI (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली) के प्रसिद्ध आनुवंशिकीविद् डॉ. के.वी. प्रभु और आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ANDUAT), कुमारगंज, अयोध्या के डॉ. आर.सी. चौधरी (पीआरडीएफ) की टीमों को जाता है। इन्होंने पारंपरिक लंबे पौधों (जो हवा में गिर जाते थे) के जीन में सुधार कर बौनी और अर्ध-बौनी (Semi-dwarf) किस्में तैयार कीं।
बौना काला नमक धान की सभी उन्नत किस्में: विस्तृत विवरण (Detailed Types List)
वैज्ञानिकों ने पारंपरिक सुगंध और औषधीय गुणों को बिना नुकसान पहुँचाए, जेनेटिक इंजीनियरिंग और चयन विधि द्वारा निम्नलिखित बौनी और अर्ध-बौनी (Semi-dwarf) किस्में तैयार की हैं:
1. पूसा नरेंद्र कालानमक 1638 (Pusa Narendra Kalanamak 1638)
- विकास और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि: यह IARI (नई दिल्ली) और ANDUAT (अयोध्या) की सबसे सफल संयुक्त खोज है। इसमें पारंपरिक काला नमक के साथ ‘पूसा बासमती 1121’ के कुछ गुणों को क्रॉस कराकर इसके कद को छोटा किया गया है।
- पौधे की संरचना: इसके पौधे की ऊंचाई 95 से 100 सेमी होती है। इसके तने इतने मजबूत होते हैं कि बाली में भारी दाने भरने के बाद भी पौधा बिल्कुल सीधा खड़ा रहता है।
- समय और उपज: यह रोपाई के बाद 135 से 140 दिनों में पूरी तरह पक जाती है। इसकी औसत पैदावार 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।
- दाने की विशेषता: इसका चावल पकने के बाद सामान्य से दोगुना लंबा हो जाता है और इसमें पारंपरिक सोंधी खुशबू बरकरार रहती है।
2. पूसा नरेंद्र कालानमक 1652 (Pusa Narendra Kalanamak 1652)
- विकास: इसे भी IARI और ANDUAT ने मिलकर पूसा नरेंद्र 1638 के बाद और अधिक सुधार के साथ जारी किया था।
- रोग प्रतिरोधकता (가장 खास गुण): यह किस्म उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में लगने वाले खतरनाक बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB – जीवाणु जनित झुलसा रोग) और शीथ ब्लाइट के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी है। इसमें दवाओं का खर्च बहुत कम आता है।
- समय और उपज: यह भी 135 से 138 दिन का समय लेती है और इसकी पैदावार 48 से 52 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक देखी गई है।
3. कालानमक किरण (Kalanamak Kiran)
- विकास: इस अर्ध-बौनी किस्म को आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय (ANDUAT) द्वारा विशुद्ध रूप से उत्तर प्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों के लिए ‘चयन विधि’ (Selection Method) से सुधारा गया है।
- विशेषता: यह किस्म उन क्षेत्रों के लिए वरदान है जहाँ पानी का भराव थोड़ा अधिक होता है या जहाँ सूखा पड़ने की संभावना होती है। इसके पौधे की ऊंचाई लगभग 100 से 105 सेमी होती है।
- उपज: यह लगभग 140 से 145 दिन लेती है और इसकी औसत पैदावार 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
4. नरेंद्र कालानमक 1 (Narendra Kalanamak 1)
- विशेषता: यह ANDUAT द्वारा जारी शुरुआती अर्ध-बौनी किस्मों में से एक है। इसका दाना थोड़ा छोटा लेकिन बेहद चमकदार और गहरे रंग की भूसी वाला होता है।
- फायदा: इसका चावल पचने में बहुत हल्का होता है और इसमें आयरन की मात्रा अन्य किस्मों की तुलना में काफी अच्छी पाई गई है। यह 140 दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
5. कालानमक 3 (KN 3) और पीआरडीएफ किस्में (PRDF Series)
- पीआरडीएफ (पैलेंटियोलॉजिकल रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन, गोरखपुर) के वैज्ञानिकों (जैसे डॉ. आर.सी. चौधरी) ने भी स्थानीय स्तर पर कई सुधार किए हैं।
- विशेषता: ये किस्में मुख्य रूप से सिद्धार्थनगर और बस्ती जिले की मिट्टी के लिए सबसे बेस्ट मानी जाती हैं। इनका चावल टूटने (Brokens) की दर बहुत कम होती है, जिससे मिलिंग के समय किसानों को पूरा का पूरा साबुत चावल मिलता है।
📋 सभी किस्मों का तुलनात्मक चार्ट (Quick Assessment Table)
| किस्म का सटीक नाम | विकासक संस्थान (Developer) | पकने की अवधि | औसत उपज (प्रति हेक्टेयर) | सबसे बड़ी खूबी |
| पूसा नरेंद्र कालानमक 1638 | IARI + ANDUAT | 135 – 140 दिन | 45 – 50 क्विंटल | मजबूत तना, शानदार खुशबू और बेहतरीन लंबाई |
| पूसा नरेंद्र कालानमक 1652 | IARI + ANDUAT | 135 – 138 दिन | 48 – 52 क्विंटल | झुलसा रोग (BLB) के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी |
| कालानमक किरण | ANDUAT | 140 – 145 दिन | 40 – 45 क्विंटल | सूखा और तराई के प्रतिकूल मौसम में सहनशील |
| नरेंद्र कालानमक 1 | ANDUAT | 140 दिन | 38 – 42 क्विंटल | अधिक आयरन और प्रीमियम पारंपरिक स्वाद |
बौना काला नमक के मुख्य लाभ (Advantages)
- तूफान और बारिश से सुरक्षा: पौधे छोटे होने के कारण यह तेज हवाओं में भी सीधे खड़े रहते हैं, जिससे दानों की चमक और पैदावार सुरक्षित रहती है।
- दोगुनी से ज्यादा उपज: पारंपरिक किस्मों की तुलना में इन बौनी किस्मों की पैदावार 150% तक अधिक मिलती है।
- समय की बचत: 160-170 दिनों के मुकाबले ये किस्में 135-142 दिनों में कट जाती हैं, जिससे किसान रबी सीजन में आलू, मटर या समय पर गेहूं बो सकते हैं।
बुवाई और रोपाई की सटीक विधि (How to Sow)
- नर्सरी का सही समय: इसकी नर्सरी डालने का सर्वोत्तम समय 20 मई से 15 जून के बीच है।
- बीज दर: एक एकड़ खेत की रोपाई के लिए 10 से 12 किलोग्राम प्रमाणित बीज की आवश्यकता होती है।
- बीज शोधन (Seed Treatment): बुवाई से पहले बीजों को कार्बोक्सीन + थिरम (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) या ट्राइकोडर्मा से उपचारित अवश्य करें ताकि बकानी (मूर्ख पौधा रोग) और झुलसा रोग से सुरक्षा मिल सके।
- रोपाई: 21 से 25 दिन पुरानी पौध की रोपाई मुख्य खेत में 20 सेमी (लाइन से लाइन) x 15 सेमी (पौधे से पौधे) की दूरी पर करें। एक स्थान पर केवल 2-3 पौधे ही लगाएं।
खाद एवं पोषक तत्व प्रबंधन (Nutrition Required)
बौना काला नमक में सुगंध और बेहतरीन स्वाद बनाए रखने के लिए रासायनिक खादों का अनियंत्रित उपयोग नहीं करना चाहिए। अत्यधिक यूरिया डालने से इसकी सुगंध कम हो जाती है।
- जैविक खाद: खेत तैयार करते समय प्रति एकड़ 3-4 टन अच्छी सड़ी गोबर की खाद या 10 क्विंटल केंचुए की खाद (Vermicompost) जरूर मिलाएं।
- रासायनिक उर्वरक (प्रति एकड़):
- नाइट्रोजन (यूरिया): 30-35 किलोग्राम (इसे तीन हिस्सों में दें: 1/3 हिस्सा रोपाई के समय, 1/3 हिस्सा कल्ले फूटते समय और आखिरी 1/3 हिस्सा बाली निकलने से ठीक पहले)।
- फास्फोरस (SSP): 30 किलोग्राम और पोटाश (MOP): 15 किलोग्राम रोपाई के समय आखिरी जुताई में दें।
- जिंक सल्फेट: तराई क्षेत्र की मिट्टी के लिए 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ देना बेहद जरूरी है।
रोग और कीट नियंत्रण (Pesticides & Crop Protection)
हालांकि IARI और ANDUAT की ये किस्में काफी सहनशील हैं, फिर भी मौसम खराब होने पर निम्नलिखित उपाय करें:
- झोंका रोग (Blast Disease): पत्तियों पर आंख के आकार के भूरे धब्बे दिखने पर ट्राइसाइक्लाजोल 75 WP (120 ग्राम प्रति एकड़) को 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
- तना छेदक (Stem Borer) / पत्ती लपेटक: यदि पौधे की बीच की पत्ती सूखने लगे या सफेद बालियां दिखें, तो फर्टेरा (Chlorantraniliprole 0.4% GR) 4 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बालू या खाद में मिलाकर खेत में बिखेरें।
किसान पॉलिसी की सलाह (Kisan Policy Tip): चूंकि उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर, गोरखपुर और बस्ती क्षेत्र के काला नमक चावल को जीआई टैग मिला हुआ है, इसलिए यदि आप इन सरकारी प्रामाणिक बीजों का उपयोग करके जैविक खेती करते हैं, तो आप इसे बहुत ऊंचे दामों पर बेचकर सामान्य धान से तीन गुना तक मुनाफा कमा सकते हैं।
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