सांभा मंसूरी धान (BPT-5204) की वैज्ञानिक खेती: कम लागत में प्रीमियम चावल और बंपर पैदावार की पूरी गाइड

सांभा मंसूरी, Samba Mahsuri, BPT-5204 paddy variety

उत्तर प्रदेश में जब प्रीमियम, बारीक और खाने में सबसे स्वादिष्ट चावल की बात आती है, तो ‘सांभा मंसूरी’ (जिसे वैज्ञानिक भाषा में BPT-5204 कहा जाता है) का नाम सबसे पहले आता है। अपने बेहतरीन स्वाद, कम टूटन और बाजार में मिलने वाले ऊंचे दामों के कारण यह किस्म दशकों से पूर्वी उत्तर प्रदेश (Purvanchal) के किसानों की पहली पसंद बनी हुई है।

आज के इस लेख में हम सांभा मंसूरी धान का परिचय, पूर्वी यूपी के उपयुक्त जिले, जलवायु, मिट्टी, खाद प्रबंधन और रोग नियंत्रण की पूरी वैज्ञानिक विधि जानेंगे ताकि आप इस सीजन में रिकॉर्ड तोड़ मुनाफा कमा सकें।

सांभा मंसूरी (BPT-5204) का परिचय (Introduction)

सांभा मंसूरी को आंध्र प्रदेश के गुंटूर (बापटला) स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र द्वारा विकसित किया गया था, इसलिए इसका आधिकारिक नाम BPT-5204 है। यह एक मध्यम से देर से पकने वाली (Medium-late duration) किस्म है।

इसका चावल बेहद बारीक, छोटा और चमकदार सफेद होता है। पकने के बाद इसका भात बिल्कुल खिला-खिला और मुलायम रहता है, जिसके कारण घरेलू बाजारों के साथ-साथ बड़े होटलों और निर्यात (Export) के लिए इसकी भारी मांग रहती है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश (Eastern UP) के उपयुक्त जिले

सांभा मंसूरी धान को बढ़ने के लिए भरपूर नमी और सिंचित क्षेत्र की आवश्यकता होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) की जलवायु और तराई की मिट्टी इसके लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। पूर्वी यूपी के निम्नलिखित जिलों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है:

  • बस्ती और गोरखपुर मंडल: बस्ती, गोरखपुर, संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर और आजमगढ़।
  • वाराणसी और प्रयागराज बेल्ट: वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर, चंदौली (जिसे यूपी का ‘चावल का कटोरा’ भी कहा जाता है), प्रयागराज और प्रतापगढ़।
  • गोंडा और बहराइच क्षेत्र: गोंडा, बहराइच, बलरामपुर और सुल्तानपुर।

अन्य राज्य और क्षेत्र जहाँ सांभा मंसूरी की खेती की जा सकती है (Other Growing Regions)

हालांकि सांभा मंसूरी (BPT-5204) पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई बेल्ट में बेहद लोकप्रिय है, लेकिन अपनी अनुकूलन क्षमता (Adaptability) के कारण यह भारत के कई अन्य प्रमुख धान उत्पादक राज्यों और उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी बड़े पैमाने पर उगाई और पसंद की जाती है:

1. उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्से

  • मध्य उत्तर प्रदेश: लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी, फैजाबाद (अयोध्या), और सुल्तानपुर के सिंचित मैदानी इलाकों में इसकी अच्छी खेती होती है।
  • तराई बेल्ट (मध्य-उत्तर): लखीमपुर खीरी, पीलीभीत और शाहजहांपुर के भारी दोमट मिट्टी वाले क्षेत्रों में भी किसान इसकी खेती से बढ़िया मुनाफा कमा रहे हैं।

2. भारत के अन्य प्रमुख राज्य

चूंकि इस किस्म का मूल निकास दक्षिण भारत से है, इसलिए यह देश के कई हिस्सों में रीढ़ की हड्डी मानी जाती है:

  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: कृष्णा, गुंटूर, गोदावरी और नलगोंडा जिलों में यह वहां की मुख्य फसलों में से एक है। बापटला अनुसंधान केंद्र से निकलने के कारण वहां के किसान इसे सबसे ज्यादा प्राथमिकता देते हैं।
  • बिहार और झारखंड: उत्तर प्रदेश से सटे बिहार के बक्सर, भोजपुर, रोहतास (बिहार का चावल का कटोरा), और चंपारण जिलों की भारी मिट्टी इसके लिए बेहद अनुकूल है। झारखंड के सिंचित घाटी क्षेत्रों में भी इसे उगाया जाता है।
  • पश्चिम बंगाल और ओड़िशा: यहाँ के गंगा के मैदानी और डेल्टा क्षेत्रों में, विशेषकर जहाँ सिंचाई के पक्के साधन हैं, वहाँ इसकी पैदावार बहुत शानदार मिलती है।
  • कर्नाटक और तमिलनाडु: कावेरी और तुंगभद्रा नदी के कमान क्षेत्रों (Command Areas) में बारीक चावल के शौकीनों के लिए सांभा मंसूरी पहली पसंद है।

ध्यान दें: पंजाब और हरियाणा जैसे अत्यधिक अगेती गेहूं चक्र वाले राज्यों में इसे कम उगाया जाता है, क्योंकि इसकी 145 दिनों की लंबी अवधि के कारण वहां गेहूं की बुवाई में देरी होने का खतरा रहता है। लेकिन जिन राज्यों या क्षेत्रों में सिंचाई के भरपूर साधन हैं और मिट्टी में नमी रोकने की क्षमता अच्छी है, वहाँ इसे बिना किसी हिचकिचाहट के उगाया जा सकता है।

सांभा मंसूरी की उन्नत किस्में (Varieties)

मूल BPT-5204 के अलावा, वैज्ञानिकों ने इसके जीन में सुधार करके नई प्रतिरोधी किस्में तैयार की हैं:

  1. सब्ज – 1 (Samba Mahsuri Sub-1): यह सांभा मंसूरी की वह उन्नत किस्म है जो पानी में डूबने की अद्भुत क्षमता रखती है। पूर्वी यूपी के निचले इलाकों में जहाँ बाढ़ या जलभराव की समस्या होती है, वहाँ यह फसल पानी में 14 दिनों तक डूबे रहने के बाद भी खराब नहीं होती।
  2. उन्नत सांभा मंसूरी (Improved Samba Mahsuri – ISM): मूल BPT-5204 में सबसे बड़ी समस्या बैक्टीरियल ब्लाइट (जीवाणु झुलसा रोग) की थी। हैदराबाद के वैज्ञानिकों (CCMB और IIRR) ने इसके बेहतर संस्करण ‘उन्नत सांभा मंसूरी’ को विकसित किया है, जो झुलसा रोग के प्रति पूरी तरह प्रतिरोधी है।

उपयुक्त मिट्टी और भूमि का चयन (Soil and Land Type)

सांभा मंसूरी धान से अधिकतम पैदावार लेने के लिए भूमि का चयन बहुत महत्वपूर्ण है:

  • मिट्टी का प्रकार: भारी मटियार, दोमट (Clay Loam) या चिकनी मिट्टी इसके लिए सबसे सर्वोत्तम है, क्योंकि इस मिट्टी में जल धारण करने की क्षमता (Water Retention Capacity) अधिक होती है।
  • भूमि का प्रकार: इसके लिए मध्यम से निचली भूमि (Low-lying to Medium Lands) सबसे उपयुक्त होती है, जहाँ खेत में पानी को आसानी से कुछ दिनों के लिए रोका जा सके। पहाड़ी या अत्यधिक रेतीली भूमि पर इसे कतई न उगाएं।

बुवाई और कटाई की समय अवधि (Sowing and Harvesting Period)

चूंकि यह 140 से 145 दिनों की लंबी अवधि वाली फसल है, इसलिए इसकी समय पर बुवाई बेहद जरूरी है:

  • नर्सरी (बिचड़ा) डालने का समय: 25 मई से 15 जून के बीच नर्सरी अवश्य डाल दें।
  • रोपाई का सही समय: जब पौध 21 से 25 दिन की हो जाए (20 जून से 15 जुलाई के बीच), तब मुख्य खेत में रोपाई कर देनी चाहिए। देर से रोपाई करने पर कल्ले कम निकलते हैं और पैदावार घट जाती है।
  • कटाई (Harvesting): यह फसल अक्टूबर के अंत या नवंबर के पहले सप्ताह तक पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। जब बालियां सुनहरे रंग की हो जाएं और दानों में नमी 20% के आसपास हो, तब इसकी कटाई कर लेनी चाहिए।

रोपाई की वैज्ञानिक विधि (Methods of Growing)

  1. खेत की तैयारी: रोटावेटर से जुताई के बाद खेत में पानी भरकर अच्छी तरह से लेव (पडलिंग/Puddling) लगाएं। इससे मिट्टी के बारीक छिद्र बंद हो जाते हैं और पानी लंबे समय तक टिकता है।
  2. पौध की दूरी: रोपाई करते समय लाइन से लाइन की दूरी 20 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।
  3. पौधों की संख्या: एक स्थान (Hill) पर केवल 2 से 3 स्वस्थ पौधे ही लगाएं। गहरा रोपने के बजाय पौधों को 2-3 सेमी की उथली गहराई पर रोपें ताकि कल्ले अच्छे फूटें।

खाद एवं पोषक तत्व प्रबंधन (Fertilizer Required)

सांभा मंसूरी धान को संतुलित पोषण की आवश्यकता होती है। प्रति एकड़ के हिसाब से निम्नलिखित चार्ट का पालन करें:

  • गोबर की खाद: खेत की आखिरी तैयारी के समय 3 से 4 टन सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिलाएं।
  • नाइट्रोजन (यूरिया): कुल 45 किलोग्राम प्रति एकड़। इसे तीन बराबर भागों में दें (रोपाई के समय, रोपाई के 25 दिन बाद कल्ले फूटते समय, और 50 दिन बाद बाली बनने की शुरुआती अवस्था में)।
  • फास्फोरस (DAP या SSP): 30 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट (SSP) या 20 किलोग्राम डीएपी रोपाई के समय दें।
  • पोटाश (MOP): 20 किलोग्राम म्यूटेट ऑफ पोटाश (MOP) आखिरी जुताई में दें। यह दानों को मजबूत और चमकदार बनाता है।
  • जिंक सल्फेट: पूर्वी यूपी की मिट्टी में जिंक की कमी आम है। कल्ले बढ़ाने और खैरा रोग से बचाव के लिए 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट (21%) प्रति एकड़ जरूर डालें।

रोग और कीट नियंत्रण (Need of Pesticides)

पारंपरिक BPT-5204 में रोगों का खतरा थोड़ा अधिक होता है, इसलिए इसकी सख्त निगरानी जरूरी है:

  • बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (जीवाणु झुलसा): इसमें पत्तियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं। इससे बचाव के लिए नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक प्रयोग रोक दें। रोग दिखने पर स्ट्रैप्टोसाइक्लिन (Streptocycline) 6 ग्राम + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
  • शीथ ब्लाइट (तने का सड़ना): तने पर सांप की केंचुली जैसे धब्बे बनते हैं। इसके नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल 5% ईसी (200 मिलीलीटर प्रति एकड़) का छिड़काव करें।
  • तना छेदक (Stem Borer): बालियां सफेद आने लगती हैं। इसके लिए खेत में पानी का स्तर बनाए रखें और रोपाई के 30 दिन बाद कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 4% दानेदार (7-8 किलोग्राम प्रति एकड़) खाद में मिलाकर बिखेरें।

कुल पैदावार (Yield)

यदि वैज्ञानिक विधि, उन्नत बीज (जैसे ISM या Sub-1) और सही खाद प्रबंधन का उपयोग किया जाए, तो सांभा मंसूरी (BPT-5204) से औसतन 22 से 26 क्विंटल प्रति एकड़ (55 से 65 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक की बंपर पैदावार आसानी से ली जा सकती है। चूंकि इसका बाजार भाव आम मोटे धान से ₹400 से ₹600 प्रति क्विंटल अधिक होता है, इसलिए यह पूर्वी यूपी के किसानों को कम लागत में शुद्ध मुनाफा देती है।

किसान पॉलिसी की सलाह (Kisan Policy Tip): सांभा मंसूरी धान की कटाई के तुरंत बाद खेत खाली होने पर आप पिसिनिया (अगेती गेहूं) या लेट वैरायटी की सरसों की खेती की योजना बना सकते हैं।

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