उत्तर प्रदेश, विशेषकर पूर्वांचल और तराई के क्षेत्रों में जब किसी ऐसी धान की किस्म की बात आती है जो कम लागत, सामान्य सिंचाई और विपरीत मौसम में भी किसानों को निराश न करे, तो सरजू-52 (Sarjoo 52) का नाम सबसे ऊपर आता है। नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ANDUAT), कुमारगंज, अयोध्या द्वारा विकसित यह किस्म दशकों से उत्तर प्रदेश के किसानों के दिलों पर राज कर रही है।
आज के इस लेख में हम सरजू-52 धान की विशेषताएं, इसकी समय अवधि, उपयुक्त क्षेत्र, खाद प्रबंधन और कीट नियंत्रण की पूरी वैज्ञानिक विधि जानेंगे ताकि आप इस सीजन में अपनी लागत घटाकर मुनाफा बढ़ा सकें।
सरजू-52 धान की मुख्य विशेषताएं (Introduction & Features)
सरजू-52 एक मध्यम अवधि में पककर तैयार होने वाली अत्यधिक लोकप्रिय सरकारी (Certified) किस्म है।
- पौधे की बनावट: इसके पौधे की ऊंचाई मध्यम (लगभग 105 से 110 सेमी) होती है। इसके तने बेहद मजबूत होते हैं, जिससे भारी बालियां आने पर भी फसल खेत में आसानी से गिरती (Lodging) नहीं है।
- दाने का प्रकार: इसका दाना मध्यम मोटा, लंबा और वजनदार होता है। चावल में स्टार्च की अच्छी मात्रा होने के कारण इसका पोहा (चूड़ा) बहुत बेहतरीन बनता है, जिससे बाजारों और मिलों में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है।
- कल्लों की संख्या: इसके एक पौधे से 12 से 15 स्वस्थ कल्ले (Tillers) निकलते हैं, जो इसकी उच्च पैदावार का मुख्य कारण हैं।
उपयुक्त क्षेत्र (Where it can be Grown)
सरजू-52 धान उत्तर प्रदेश की जलवायु और मिट्टी के लिए ही विशेष रूप से तैयार किया गया है।
- उत्तर प्रदेश के मुख्य जिले: पूर्वी उत्तर प्रदेश (बस्ती, गोरखपुर, संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, मऊ, आजमगढ़, गाजीपुर, और गोंडा) में इसकी खेती सबसे ज्यादा की जाती है। इसके अलावा मध्य यूपी के बाराबंकी, रायबरेली, और सुल्तानपुर जिलों में भी यह काफी लोकप्रिय है।
- अन्य राज्य: यूपी के अलावा यह बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों की मैदानी व सिंचित भूमियों के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है।
उपयुक्त मिट्टी और भूमि (Soil & Land Required)
- मिट्टी का प्रकार: मटियार दोमट (Clay Loam), भारी दोमट या चिकनी मिट्टी इसके लिए सबसे उत्तम है। मिट्टी का पीएच (pH) मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
- भूमि का प्रकार: यह किस्म मध्यम से गहरे पानी वाले क्षेत्रों (Medium to Low-lying lands) के लिए वरदान है। यह हल्के जलभराव को भी आसानी से सहन कर सकती है।
समय अवधि (Sowing & Harvesting Period)
- नर्सरी डालने का समय: सरजू-52 की नर्सरी 20 मई से 15 जून के बीच डाल देनी चाहिए।
- रोपाई का समय: जब नर्सरी के पौधे 21 से 25 दिन के हो जाएं (15 जून से 15 जुलाई तक), तब इसकी मुख्य खेत में रोपाई कर देनी चाहिए।
- कुल अवधि: यह किस्म नर्सरी से लेकर कटाई तक कुल 130 से 135 दिनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। इसकी कटाई अक्टूबर के मध्य तक आसानी से हो जाती है, जिससे अगेती आलू और सरसों की बुवाई के लिए खेत समय पर खाली हो जाता है।
बुवाई और रोपाई की विधि (Method of Growing)
- बीज की मात्रा और शोधन: एक एकड़ की रोपाई के लिए 12 से 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले बीजों को बाविस्टिन (2 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित जरूर करें।
- खेत की तैयारी: खेत में पानी भरकर कल्टीवेटर या रोटावेटर से अच्छी तरह पडलिंग (लेव) कर लें और पाटा चलाकर भूमि को समतल कर लें।
- रोपाई की दूरी: पौधों की रोपाई 20 सेमी (लाइन से लाइन) x 15 सेमी (पौधे से पौधे) की दूरी पर करें। एक स्थान पर 2 से 3 स्वस्थ पौधे ही लगाएं।
खाद एवं पोषक तत्व प्रबंधन (Nutrient Management)
सरजू-52 से अधिकतम पैदावार लेने के लिए प्रति एकड़ के हिसाब से संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें:
- गोबर की खाद: आखिरी जुताई के समय खेत में 3-4 टन सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं।
- यूरिया (नाइट्रोजन): कुल 40-45 किलोग्राम प्रति एकड़। इसे तीन भागों में दें: 1/3 हिस्सा रोपाई के समय, 1/3 हिस्सा रोपाई के 25 दिन बाद (कल्ले फूटते समय) और आखिरी 1/3 हिस्सा रोपाई के 50 दिन बाद (बाली आने की शुरुआती अवस्था में)।
- फास्फोरस (DAP): 25-30 किलोग्राम डीएपी रोपाई के समय आखिरी जुताई में दें।
- पोटाश (MOP): 20 किलोग्राम म्यूटेट ऑफ पोटाश अवश्य डालें, यह दानों को खोखला होने से बचाता है।
- जिंक सल्फेट: सरजू-52 में जिंक की कमी के कारण पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं (खैरा रोग)। इससे बचाव के लिए 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट (21%) प्रति एकड़ रोपाई के समय जरूर डालें।
रोग और कीट नियंत्रण (Pesticide & Crop Protection)
सरजू-52 काफी मजबूत किस्म है, लेकिन मौसम के उतार-चढ़ाव के कारण इसमें कुछ रोग आ सकते हैं:
- जीवाणु झुलसा रोग (Bacterial Leaf Blight): इसमें पत्तियों के किनारे ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगते हैं। इसके नियंत्रण के लिए यूरिया का छिड़काव तुरंत रोक दें और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (500 ग्राम) + स्ट्रैप्टोसाइक्लिन (6 ग्राम) को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।
- तना छेदक (Stem Borer): यह कीट तने को अंदर से काट देता है जिससे बालियां सफेद और खाली निकलती हैं। इसके बचाव के लिए रोपाई के 30-35 दिन बाद कार्टाप हाइड्रोक्लोराइड 4% जी (7-8 किलो प्रति एकड़) बालू या खाद में मिलाकर खेत में डालें।
- भूरा फुदका (Brown Plant Hopper – BPH): यह कीट पौधों के निचले हिस्से में रस चूसता है। इसके दिखने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एसएल (100 मिलीलीटर प्रति एकड़) का जड़ों के पास छिड़काव करें।
कुल पैदावार (Yield)
सरजू-52 अपनी स्थिर और भारी पैदावार के लिए ही जानी जाती है। सामान्य मौसम और वैज्ञानिक देखरेख में यह आसानी से 24 से 28 क्विंटल प्रति एकड़ (60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक की बंपर पैदावार दे देती है। यदि उन्नत कृषि तकनीकों और समय पर रोग प्रबंधन किया जाए, तो इसकी अधिकतम पैदावार 30 क्विंटल प्रति एकड़ तक भी जा सकती है।
किसान पॉलिसी की सलाह (Kisan Policy Tip): सरजू-52 उन किसान भाइयों के लिए सबसे बेहतरीन विकल्प है जिनके पास मध्यम सिंचाई के साधन हैं और जो बिना ज्यादा तामझाम के एक सुरक्षित और भारी पैदावार देने वाली पारंपरिक फसल उगाना चाहते हैं।
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